हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | अल्लाह तआला कुरआन मजीद में फरमाता है:
“وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْقُرَیٰ آمَنُوا وَاتَّقَوْا لَفَتَحْنَا عَلَیْهِمْ بَرَکَاتٍ مِنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ وَلَٰکِنْ کَذَّبُوا فَأَخَذْنَاهُمْ بِمَا کَانُوا یَکْسِبُونَ और यदि उन बस्तियों के रहने वाले ईमान लाते और तक़वा अपनाते, तो हम उनके लिए आकाश और धरती की बरकतों के द्वार खोल देते, लेकिन उन्होंने झुठलाया, इसलिए हमने उन्हें उनके कर्मों के कारण सज़ा दी।” (सूर ए आराफ़, आयत 96)
व्याख्या:
कभी-कभी हम सोचते हैं कि समाज की तरक्की के लिए केवल अर्थव्यवस्था, उत्पादन, पूंजी और भौतिक संसाधनों पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन धर्म की दृष्टि में बहुत-सी भौतिक बरकतों की जड़ इंसान और समाज के सुधार में है। जिस समाज में ईमान, तक़वा, नैतिकता और आध्यात्मिकता मजबूत होती है, वह केवल आत्मिक और आध्यात्मिक रूप से ही विकास नहीं करता, बल्कि इसका प्रभाव लोगों के आर्थिक और सामाजिक जीवन पर भी दिखाई दे सकता है।
उपरोक्त आयत हमारी सोच और विशेष रूप से अधिकारियों के दृष्टिकोण को बदल सकती है और उन्हें लोगों के व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में धार्मिक संस्कृति को मजबूत करने की ओर प्रेरित कर सकती है। सभी लोगों, विशेष रूप से समाज के सांस्कृतिक अधिकारियों को यह समझना चाहिए कि लोगों के ईमान और नैतिकता में निवेश करना केवल आख़िरत के लिए किया जाने वाला निवेश नहीं है, बल्कि यह दुनिया की खुशहाली और विकास का आधार भी बन सकता है।
जितना अधिक लोग ईमानदारी, न्याय, जिम्मेदारी, अत्याचार और धोखे से बचने, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने और अल्लाह के प्रति तक़वा अपनाने के लिए प्रतिबद्ध होंगे, उतना ही समाज उन समस्याओं से सुरक्षित रहेगा, जो उसकी भौतिक और मानवीय पूंजी को बर्बाद करती हैं। इसलिए संस्कृति और आध्यात्मिकता समाज के जीवन का कोई किनारा नहीं, बल्कि उसकी खुशहाली और विकास के सबसे महत्वपूर्ण आधारों में से एक है।
कभी-कभी समाज के लोग और जिम्मेदार अधिकारी, जो सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के तरीकों को लेकर चिंतित रहते हैं, खुद को रुकावटों, प्रतिबंधों और दुश्मनी के बीच घिरा हुआ महसूस करते हैं। कई बार यही स्थिति उनके प्रशासन और जिम्मेदारियों को निभाने में अस्थिरता का कारण बन जाती है। जबकि इस संसार के सृष्टिकर्ता और उपास्य ने इसका एक उपचार प्रस्तुत किया है। यह उपचार “तक़वा” है। इसी कारण हज़रत अली (अ) का तक़वा के बारे में यह कथन बहुत प्रसिद्ध है:
“لَوْ أَنَّ اَلسَّمَوَاتِ وَ اَلْأَرْضَ کَانَتَا عَلَی عَبْدٍ رَتْقاً ثُمَّ اِتَّقَی اَللَّهَ لَجَعَلَ لَهُ مَخْرَجاً وَ یَرْزُقْهُ مِنْ حَیْثُ لاٰ یَحْتَسِبُ यदि आकाश और धरती किसी बंदे के लिए पूरी तरह बंद हो जाएँ, फिर वह अल्लाह का तक़वा अपनाए, तो अल्लाह उसके लिए अवश्य निकलने का रास्ता बना देगा और उसे ऐसी जगह से रोज़ी देगा, जहाँ से उसे कोई उम्मीद भी नहीं होगी।” (ग़ुररुल हिकम, भाग 1, पेज 568)
इसलिए समाज में अल्लाह की शिक्षाओं और धार्मिक संस्कृति को बढ़ावा देने पर ध्यान देने से न केवल आख़िरत की बरकतें प्राप्त होंगी, बल्कि समाज के लिए भौतिक सुविधाओं और जीवन में आसानी के रास्ते भी खुलेंगे। इसके विपरीत, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में तक़वा की संस्कृति को लागू करने की ओर लोगों और जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही इंसान और समाज को अनेक भौतिक और आध्यात्मिक कठिनाइयों और गतिरोधों में डाल सकती है।
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